बहुजन महापुरुष इतिहास दुनिया में छाए, बहुजन समाज के महापुरुष
बहुजन महापुरुष इतिहास दुनिया में छाए, बहुजन समाज के महापुरुष जिन्हें कोई नहीं जानता
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| बहुजन महापुरुष इतिहास दुनिया में छाए, बहुजन समाज |
“जिस समाज का इतिहास नहीं होता है, वह समाज कभी भी शासक नहीं बन पाता है . जो समाज अपने इतिहास से भी सबक नहीं सिखाता है, वह समाज कभी भी शासक नहीं बन पाता है . जो समाज अपने बहुजन महापुरुषों के आंदोलन से भी सबक नहीं सिखाता है, वह समाज कभी भी शासक नहीं बन पाता है . जो समाज अपने बहुजन महापुरुषों के उद्देश्य स्वतंत्रता, समानता,नैतिकता, भाईचारा और न्याय को प्रस्थापित करने की कोशिश नहीं करता हैं, वह समाज कभी भी शासक नहीं बन पाता है . जो समाज अपने बहुजन महापुरुषों कि विचारधारा “बहुजन हीताय बहुजन सुखाय ” पर नहीं चलता है, वह समाज कभी भी शासक नहीं बन पाता है . क्योंकि अपने बहुजन महापुरुषों के आंदोलन के उद्देश्य औरविचारधारा से प्रेरणा मिलती है, प्रेरणा से जागृति आती है, जागृति से सोच बनती है, सोच से ताकत बनती है, ताकत से शक्ति बनती है और शक्ति से शासक बनता है
गौतम बुद्ध:
बुद्ध के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखाने जैसाहै,उनके व्यक्तित्व और सिद्धांत के आगे कोई नहीं टिक सकता| जो एक बार बौध धम्म कोठीक से समझ लेता है वो फिर कहीं नहीं जा सकता| बौद्ध धर्म को पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं और यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है। भगवान् बुद्ध को ‘गौतम बुद्ध ‘, ‘ महात्मा बुद्ध ‘ आदि नामों से भी जाना जाता है। वे संसार प्रसिद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक हैं। बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है। आज बौद्ध धर्म सारे संसार के चार बड़े धर्मों में से एक है। इसके अनुयायियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। इस धर्म के संस्थापक भगवान् बुद्ध राजा शुद्धोदन के पुत्र थे और इनका जन्म स्थान लुम्बिनी नामक ग्राम था। वे छठवीं से पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जीवित थे। उनके गुज़रने के बाद अगली पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला गया और अगले दो हज़ार सालों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फैल गया।
यदि आप देश की किसी भी धर्म कौम या झंडे से ज्यादा प्रेम करते हैं,
यदि आप समानता के पक्षधर हैं
यदि आप भारत की सभी समस्याओं की जड़ में पहुचना चाहते हो
यदि आप अपने जीवन में दुखों से मुक्ति चाहते हो
यधि आपको धार्मिक सत्ये जानना है
तो बस बौध धम्म के सिधान्तों और साहित्य को एक बार कुछ समय दे दो मानना न मानना बाद की बात है
आज बौध धर्म का सबसे बड़ा नुक्सान ये बात कर रही है की ये दलितों का धर्म है जिसके वजह से इसे लोग समझने के लिए भी तयार नहीं जबकि ये वो मत है की इसे जो भी एक बार ठीक से समझ ले उसे फिर दुनिया में किसी भी धर्म के सिद्धांत खोकले लगते हैं।
भगवान् बुद्धा ने कहा है :
“मोह में हम किसी की बुराइयाँ नहीं देख सकते और घृणा में हम किसी की अच्छाईयाँ नहीं देख सकते” ।
धम्म विरोधी अवसरवादियों द्वारा फैलाई गई घृणा के कारन आज आम जनता दुखी है पर दुःख दूर करने के स्रोत तक नहीं जाना चाहती।आपसे आग्रह है की एक बार इसे जानकार तो देखो मानना न मानना तो बाद की बात है|
कहा जाता है जी बौध और ब्राह्मण एक दुसरे के परस्पर विरोधी रहे हैं पर असल में ये बात केवल राजनेतिक कारणों से ही सही है। धार्मिक कारणों से तो क्या ब्राह्मण क्या मुसलमान क्या इसाई क्या अन्य कोई बौध मत के आगे कोई ज्यादा देर तक इसे अपनाने से खुद को नहीं रोक सकता। ऐसा इसलिए नहीं की ये सबसे अच्छा धर्म है बल्कि इसलिए की केवल यहाँ सत्य और तर्क ज्यादा है बाकि जगह कल्पना,गुटबाजी और पुरोहितवाद ज्यादा है । इसी कड़ी में प्रस्तुत है बौध धम्म के कुछ जाने माने महान अनुयायी
1. समराट अशोक महान :
संसार के इतिहास में केवल 3 राजाओं को ही उनके नाम के साथ ‘महान’ कहकर सम्भोदित किया जाता है एक अलेक्जेंडर दुसरे अकबर और हमारे अपने महान समराट अशोकाभारत का सम्पूर्ण इतिहास विदेशिओं द्वारा हारने का इतिहास है केवल बौध मत के रहा अशोक ही एक्मात्र ऐसे मूल भारतीय राजा हुए जिन्होंने सरे हुन्दुस्तान समेत आज का नेपाल बांग्लादेश पाकिस्तान और अफगानिस्तान अदि को एक देश और एक झंडे के नीचे जीत लिए थे। केवल जीता ही नहीं बल्कि अपनी प्रजा को अपने बच्चों के समान प्रेम किया और बेहतरीन सुशाशन दिया जिसकी याद में आज भी हमारा रास्ट्र चिन्ह अशोक स्थंभ और झंडे पर अशोक चक्र है ।
संसार के इतिहास में केवल 3 राजाओं को ही उनके नाम के साथ ‘महान’ कहकर सम्भोदित किया जाता है एक अलेक्जेंडर दुसरे अकबर और हमारे अपने महान समराट अशोक
सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य के बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है। जीवन के उत्तरार्ध में अशोक गौतम बुद्ध के भक्त हो गए और उन्हीं (महात्मा बुद्ध) की स्मृति में उन्होंने एक स्तम्भ खड़ा कर दिया जो आज भी नेपाल में उनके जन्मस्थल-लुम्बिनी में मायादेवी मन्दिर के पास अशोक स्तम्भ के रूप में देखा जा सकता है। उसने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथा यूनान में भी करवाया। अशोक के अभिलेखों में प्रजा के प्रति कल्याणकारी द्रष्टिकोण की अभिव्यक्ति की गई है।
2. बाबासाहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर
भीमराव आम्बेडकर एक बहुजन राजनीतिक नेता, और एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी भी थे। उन्हें बाबासाहेब के नाम से भी जाना जाता है। आम्बेडकर ने अपना सारा जीवन हिन्दू धर्म की चतुवर्ण प्रणाली, और भारतीय समाज में सर्वत्र व्याप्त जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। हिन्दू धर्म में मानव समाज को चार वर्णों में वर्गीकृत किया है। उन्हें बौद्ध महाशक्तियों के दलित आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है। आम्बेडकर को भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया है जो भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है। अपनी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों तथा देश की अमूल्य सेवा के फलस्वरूप डॉक्टर अम्बेडकर को ‘आधुनिक युग का मनु’ कहकर सम्मानित किया गया
।
डॉ. भीमराव रामजी आम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 में हुआ था। 1956 में उनका देहान्त हुआ। वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई मुरबादकर की 14वीं व अंतिम संतान थे। उनका परिवार मराठी था और वो अंबावडे नगर जो
3 ह्वेन त्सांग
भारत में ह्वेन त्सांग ने बुद्ध के जीवन से जुड़े सभी पवित्र स्थलों का भ्रमण किया और उपमहाद्वीप के पूर्व एवं पश्चिम से लगे इलाक़ो की भी यात्रा की। उन्होंने अपना अधिकांश समय नालंदा मठ में बिताया, जो बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र था, जहाँ उन्होंने संस्कृत, बौद्ध दर्शन एवं भारतीय चिंतन में दक्षता हासिल की। इसके बाद ह्वेन त्सांग ने अपना जीवन बौद्ध धर्मग्रंथों के अनुवाद में लगा दिया जो 657 ग्रंथ थे और 520 पेटियों में भारत से लाए गए थे। इस विशाल खंड के केवल छोटे से हिस्से (1330 अध्यायों में क़रीब 73 ग्रंथ) के ही अनुवाद में महायान के कुछ अत्यधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ शामिल हैं।
4. मिलिंद (मिनांडर)
मुख्य लेख : मिलिंद (मिनांडर)
उत्तर-पश्चिम भारत का ‘हिन्दी-यूनानी’ राजा ‘मनेन्दर’ 165-130 ई. पू. लगभग (भारतीय उल्लेखों के अनुसार ‘मिलिन्द‘) था। प्रथम पश्चिमी राजा जिसने बौद्ध धर्म अपनाया और मथुरा पर शासन किया। भारत में राज्य करते हुए वह बौद्ध श्रमणों के सम्पर्क में आया और आचार्य नागसेनसे उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली।
बौद्ध ग्रंथों में उसका नाम ‘मिलिन्द’ आया है। ‘मिलिन्द पञ्हो’ नाम के पालि ग्रंथ में उसके बौद्ध धर्म को स्वीकृत करने का विवरण दिया गया है। मिनान्डर के अनेक सिक्कों पर बौद्ध धर्म के ‘धर्मचक्र’ प्रवर्तन का चिह्न ‘धर्मचक्र‘ बना हुआ है, और उसने अपने नाम के साथ ‘ध्रमिक’ (धार्मिक) विशेषण दिया है।
5 सम्राट कनिष्क
कुषाण राजा कनिष्क के विशाल साम्राज्य में विविध धर्मों के अनुयायी विभिन्न लोगों का निवास था, और उसने अपनी प्रजा को संतुष्ट करने के लिए सब धर्मों के देवताओं को अपने सिक्कों पर अंकित कराया था।पर इस बात में कोई सन्देह नहीं कि कनिष्क बौद्ध धर्म का अनुयायी था, और बौद्ध इतिहास में उसका नाम अशोक के समान ही महत्त्व रखता है। आचार्य अश्वघोष ने उसे बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था। इस आचार्य को वह पाटलिपुत्र से अपने साथ लाया था, और इसी से उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी।

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